Importance Of Spiritual Knowledge

Friday, May 8, 2020

सतलोक : एक अविनाशी स्थान और वास्तविक स्वर्ग

 हम एक ऐसे स्थान के बारे में बात करेंगे जो वास्तव में अविनाशी है..!!  अर्थात जिसका विनाश नहीं होता है...!! जहां पर किसी प्रकार का दुख नहीं है। जिसे मोक्ष धाम भी कहा जाता है। 
हां यह बातें थोड़ी अजीब जरूर है...!! 
परंतु यह पूर्ण सत्य है। और इनकी सत्यता का विवेचन करेंगे। क्योंकि सतलोक एक ऐसा स्थान है। जहां पर किसी प्रकार का रोग एवम पीड़ा नहीं है...!! 
वहां पर सिर्फ सुख ही सुख है।


हम सभी पहले सतलोक में रहते थे। वहां पर जन्म मरण नहीं होता था। अर्थात हमारा मनुष्य शरीर सदा वहां पर ऐसा ही रहता था। हम सभी मनुष्य शरीर धारी और अन्य 8400000 योनियों में भटक रहे जीव उसी अविनाशी स्थान सतलोक के निवासी हैं। जो दुर्भाग्यवश इस काल लोक में आ गए हैं। और समय-समय पर हमारी मृत्यु होती रहती है। और फिर हमें नया जीवन मिलता है। हम इस काल की भूल भुलैया में ऐसे ही दुख उठाए जा रहे हैं। और हमारे उस निज स्थान सतलोक के बारे में कोई विचार नहीं कर रहा है।

सतलोक के स्वामी और पूर्ण प्रभु अविनाशी कबीर साहेब है। जिनका प्रमाण वेदो में लिखा है। वही पूर्णब्रह्म परमात्मा है। इन्होंने ही इस अविनाशी आत्मा की रचना की है।


 सतलोक के विषय में संत गरीबदास जी ने वर्णन किया है। संत गरीबदास जी एक प्रसिद्ध संत हैं। जिनको स्वयं कबीर साहेब आकर मिलेे थे। और उस और उस अविनाशी स्थान की उसके बाद संत गरीबदास जी ने कलम तोड़ व्याख्या की है उन्होंने कहा है कि

" मन तू चल रे सुख के सागर, जहाँ शब्द सिंधु रतनागर।।"
"जहाँ संखो लहर मेहर की उपजे, कहर नही जहाँ कोई।
दास गरीब अचल अविनाशी, सुख का सागर सोई।।"

अर्थात गरीबदास जी महाराज कहना चाहते हैं कि सतलोक एक ऐसा स्थान है जहां पर कोई कहर नहीं है। वहां पर सुख ही सुख है। वह एक अविनाशी स्थान है। जो वास्तविक सुख का सागर है। और हम सभी से आग्रह कर हैं कि आप उस स्थान की और प्रस्थान करें।

सतलोक सुख का सागर है वहां पर प्रत्येक वस्तु अमर तत्वों से बनी हुई है वह कभी खराब नहीं होती है। सतलोक एक ऐसा स्थान है जहां पर न मृत्यु होती है और ना ही किसी प्रकार का रोग है....!!
मनुष्य जीवन का मूल उद्देश्य सत भक्ति कर पूर्ण मोक्ष प्राप्त करना है। और पूर्ण मोक्ष की प्राप्ति सच्चे संत अर्थात तत्वदर्शी संत की शरण ग्रहण करने पर ही प्राप्त हो सकता है। जैसा कि गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 में वर्णित है।
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